प्रतिपक्ष तैयार करना और मानदंड तोड़ना साहित्य का काम

प्रतिपक्ष तैयार करना और मानदंड तोड़ना साहित्य का काम











दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुधा सिंह ने कहा है कि साहित्य का काम अपना प्रतिपक्ष तैयार करना और प्रचलित मानदंडों को तोड़ना है। ऐसा न कर पाने पर साहत्य की साथर्कता नहीं रह जाती।


प्रो. सिंह प्रेमचंद साहित्य संस्थान द्वारा गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के सहयोग से आयोजित 'सौ साल बाद सेवासदन : स्त्री मुक्ति का भारतीय पाठ' पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन मंगलवार को 'सेवासदन और भारतीय स्त्री का कल, आज और कल ' विषय पर बोल रही थीं।


प्रो. सुधा सिंह ने कहा कि भक्तिकाल का सारा संदर्भ पलट जाता है। तुलसीदास की रत्नावली पतिव्रता स्त्री के पक्ष में है। प्रेमचंद ने जिस तरह से स्त्री के असन्तोष को पंक्तिबद्ध किया, उसे समझना होगा। प्रेमचंद साहित्य के लिए साहित्य नहीं लिख रहे थे। वे समाज में उन आदर्शों को घटित होता देखना चाहते हैं, जो हकीकत में दिख रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद स्त्री के असन्तोष की चर्चा करते हुए विवाह में समानता, तलाक का समान कानून, संपत्ति के अधिकार की चर्चा करते हैं, जो बहुत महत्वपूर्ण है।


सिंगापुर की नेशनल यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग की अध्यक्ष डॉ. संध्या सिंह ने कहा कि मैं 'सेवासदन की सुमन से ज्यादा सहानुभूति नहीं रख पाती हूं। सुमन के लिए अनमेल विवाह था, लेकिन उन्होंने अपने पति से मेल बनाने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने कहा कि आज के समय में उतना बंधन नहीं है। आज का सुधार भविष्य में विस्तार पाएगा।


डीडीयू के हिन्दी विभाग में प्रो. अरविंद त्रिपाठी ने कहा कि सेवासदन गोरखपुर में जरूर लिखा गया, लेकिन इसकी पृष्ठिभूमि बनारस है। सेवासदन की 'सुमन' को सिर्फ वेश्या के रूप में देखना ठीक नहीं है। सुमन विद्रोही नायिका है। उन्होंने कहा कि श्रमकार्यों में लगी स्त्री पूरे विमर्श में हाशिये पर है। इस पर सुविचारित रचनात्मक कार्य कम दिखता है।


बनारस से आईं डॉ. वंदना चौबे ने कहा कि सेवासदन की स्त्री सुमन मुक्त है, परेशान पुरुष पात्र है। वे इसलिए परेशान हैं क्योंकि उनके बने बनाये ढांचे को चोट पहुंच रही है। उन्होंने कहा कि सुमन मूल में दार्शनिक स्त्री है। वह समान धरातल की तलाश में हैं। उन्होंने कहा कि सुमन को विचारवान स्त्री समझना होगा न कि वेश्या। सेवासदन को आज के बदलते समाज के संदर्भों में समझना होगा। समापन सत्र में मुख्य वक्तव्य बीएचयू के प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने दिया। इस सत्र में विशिष्ट वक्तव्य प्रो. सदानंद शाही ने दिया। संगोष्ठी के दौरान प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र पढ़े। प्रेमचंद साहित्य संस्थान की वरिष्ठ सदस्य सुधाराज लक्ष्मी ने धन्यवाद ज्ञापित किया।


श्रोताओं के सवालों का दिया जवाब


पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. रोहिणी अग्रवाल ने श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि मैं इस बात से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि स्त्री को जितना पीटा गया वह उतनी ही खुलती गयी, बल्कि इससे तो वह और दबा दी जाती है। सिमोन के कथन को आधार बनाकर उन्होंने कहा कि जैसे स्त्री बनाई जाती है वैसे ही पुरुष भी बनाया जाता है।इसी तर्ज पर यह कहा जा सकता है कि स्त्री अगर जिबह करने के लिए गाय है तो पुरुष खुला चरने के लिए सांड़ है।














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